संपादक डॉ मदन मोहन मिश्र की रिपोर्ट।
ATH NEWS 11 GROUP :-गयाजी बिहार के क्रिकेट जगत से एक ऐसी प्रेरणादायक और रोंगटे खड़े कर देने वाली खबर सामने आई है, जिसने हर संघर्ष करने वाले इंसान को नई उम्मीद दे दी है। गया के लाल मंगल महरौर ने अपनी कड़ी मेहनत, अटूट लगन और 15 वर्षों के लंबे संघर्ष के दम पर भारतीय घरेलू क्रिकेट में इतिहास रच दिया है। उन्हें बिहार रणजी ट्रॉफी टीम का कप्तान नियुक्त किया गया है। उनके इस मुकाम पर पहुँचने की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है।रेलवे क्वार्टर से लेकर रणजी की कप्तानी तक का सफर
मंगल महरौर का शुरुआती जीवन बेहद संघर्षों से भरा रहा। गया के एक साधारण रेलवे क्वार्टर में पले-बढ़े मंगल के पास क्रिकेट खेलने के लिए साधन सीमित थे, लेकिन जज्बा आसमान छूने वाला था। एक वक्त ऐसा भी था जब वे गया के मशहूर हरिहर सुब्रमण्यम स्टेडियम में अपनी प्रैक्टिस के लिए खुद ही पिच तैयार किया करते थे। संसाधनों की भारी कमी के बावजूद उन्होंने कभी अपने हौसले को टूटने नहीं दिया। पसीने से लथपथ होकर मैदान पर घंटों अभ्यास करना उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा था।15 साल का लंबा और कठिन संघर्ष
क्रिकेट के प्रति उनका समर्पण इस बात का प्रमाण है कि सफलता शॉर्टकट से नहीं, बल्कि निरंतरता और त्याग से मिलती है। घरेलू क्रिकेट में लगातार शानदार प्रदर्शन और अपने खेल की बदौलत उन्होंने धीरे-धीरे चयनकर्ताओं का ध्यान अपनी ओर खींचा। आज उनकी इसी 15 साल की लंबी तपस्या का सुखद परिणाम सामने आया है, जब उन्हें बिहार टीम की कप्तानी सौंपी गई है।गयाजी में जश्न का माहौल मंगल महरौर के रणजी कप्तान बनने की खबर मिलते ही उनके पैतृक शहर गया में दीवाली और होली जैसा माहौल बन गया है। उनके चाहने वाले, स्थानीय कोच, और खेल प्रेमी ढोल-नगाड़ों के साथ सड़कों पर उतर आए और एक-दूसरे को मिठाई खिलाकर अपनी खुशी का इजहार कर रहे हैं। गयावासियों का कहना है कि मंगल ने न सिर्फ अपने परिवार बल्कि पूरे शहर और बिहार का नाम राष्ट्रीय स्तर पर रोशन कर दिया है।
युवाओं के लिए प्रेरणा:-
मंगल महरौर की यह सफलता उन तमाम युवाओं के लिए एक जीवंत मिसाल है जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपने सपनों को पूरा करने की जिद रखते हैं। यह साबित करता है कि अगर इरादे बुलंद हों, तो अभाव भी प्रभाव में बदल जाते हैं।

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