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अतिथि कवि 'निष्काम' के सम्मान में सजी काव्य-गोष्ठी.

 


मिथिलेश कुमार पाण्डेय व्यूरो चीफ औरंगाबाद।



औरंगाबाद। आज दिनांक 29/07/2026‌ राष्ट्रीय साहित्यिक संस्था *शब्दाक्षर* की जिला इकाई औरंगाबाद के तत्वावधान में राष्ट्रीय प्रचार मंत्री धनंजय जयपुरी के आवास पर मंगलवार की शाम अतिथि साहित्यकार अरविंद पाठक 'निष्काम' के सम्मान में एक काव्य-गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के प्रारंभ में अतिथि कवि को अंगवस्त्र से सम्मानित किया गया तथा जिले के कुछेक साहित्यकारों की प्रकाशित पुस्तकें भेंट की गईं। आयोजित काव्य-गोष्ठी में भक्ति, श्रृंगार, हास्य और वीर रस की कविताएं पढ़ी गईं।

कवि 'निष्काम' की अध्यक्षता एवं अनिल  'अनल' के संचालन में आयोजित इस गोष्ठी का शुभारंभ सरस्वती वंदना से हुआ। धनंजय जयपुरी ने मां की महिमा पर आधारित अपनी मार्मिक कविता "मां से बढ़कर नहीं कोई नाता, है पिता, बाद जानो विधाता" का पाठ कर वातावरण को भावपूर्ण बनाया। तदुपरांत अपनी गजलों के लिए प्रसिद्ध हिमांशु 'चक्रपाणि' ने शेर सुनाया- 'वो अपने होंठ से मेरी गजल जब गुनगुनाते हैं, गजल के शब्द सारे फूल बनके मुस्कुराते हैं।'

अनुज बेचैन ने अपनी खूबसूरत गजल की प्रस्तुति देते हुए कहा कि - 'किस-किस तरह के ख्वाब दिखाने लगे हैं लोग, छू-छू के घाव दर्द बढ़ाने लगे हैं लोग। डाॅ ओमप्रकाश पाण्डेय ने अपने दोहे 'मृदु शब्दों की वर्तिका, स्वर-व्यंजन का दीप। मधुर छंद के थाल में, सजा ज्ञान संदीप ' प्रस्तुत कर खूब सराहना बटोरी।

अनिल 'अनल' ने अपने मुक्तक 'फेंके हुए पैसे को उठाता नहीं हूँ मैं, हर दर पे जाके सर को झुकता नहीं हूँ मैं' का प्रभावशाली पाठ किया, जिस पर श्रोता- समूह की भरपूर तालियां मिली। वहीं कवि नागेंद्र कुमार केशरी ने वीर रस की कविता 'पौरव कुल का राजा पोरस, था वह सिंह निराला, यूनानी आंधी का जिसने दम्भ चूर कर डाला' सुनाकर कार्यक्रम में राष्ट्रभक्ति का संचार कर दिया।

अपने अध्यक्षीय संबोधन में अरविंद पाठक 'निष्काम' ने कहा कि औरंगाबाद से उनका आत्मीय संबंध रहा है। उन्होंने बताया कि उनका ननिहाल यहीं है और उनका बचपन इसी शहर में बीता है। उन्होंने दिवंगत कवि मिथिलेश मधुकर को श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हुए जिले की सक्रिय साहित्यिक परंपरा की सराहना की। अपने काव्य पाठ में उन्होंने सुनाया— 'जो चला नहीं पथरीले पथ, जो चढ़ा नहीं पर्वत पर, जो देख नहीं पाया सूर्योदय, मैं उसकी बात करूं ही क्यों?'


पूरे आयोजन के दौरान कविता, हंसी, कहकहे, तालियों और 'वाह-वाह' की गूंज होती रही। उपस्थित साहित्यकारों ने ऐसे आयोजन को साहित्य और सांस्कृतिक चेतना के संवर्धन के लिए अत्यंत आवश्यक बताया।

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