⚡ ब्रेकिंग News

संस्‍कृत हुई गुम, हिन्दी पर भी मंडरा रहा ख़तरे का साया?-जिम्मेदार कौन ?राय आपकी ..




ATHNEWS 11 —संस्‍कृत को लेकर अक्सर कहा जाता है कि वह “गुम” हो गई; अब भाषा-चिंतकों की नज़र हिन्दी पर टिक गई है। अंग्रेज़ी-मिश्रित वाक्य, रोमन लिपि में चैट और ‘Hinglish’ मीम्स के बीच सवाल उठता है—क्या हिन्दी भी धीरे-धीरे गुमनामी की राह पर चल पड़ी है?


भाषाविद् सुधा शर्मा कहती हैं, “संस्‍कृत का क्षय रोज़-बोलचाल से कटने से हुआ। हिन्दी के साथ वैसा ख़तरा नहीं, पर शहरी युवाओं में शुद्ध प्रयोग, पढ़ने की आदत और लंबा लेखन घट रहा है।” वहीं प्रो. अजय त्रिपाठी चेताते हैं—“नीति-निर्माण, उच्च-शिक्षा और तकनीकी शब्दावली में हिन्दी को बराबर जगह न मिली, तो अगली पीढ़ी के लिए वह ‘घर की भाषा’ बन कर रह जाएगी।”


समाधान के तौर पर विशेषज्ञ स्कूलों में साहित्य-परियोजनाएँ, घरों में हिन्दी-कथा-पाठ, और सोशल मीडिया पर बिना अनुवाद के प्रयोग की वकालत कर रहे हैं। संक्षेप में—संस्‍कृत को फिर से जीवंत संवाद में लाना होगा, और हिन्दी को रोज़मर्रा की सोच-भाषा बनाए रखना होगा, ताकि वह गुमनामी के मोड़ तक न पहुँचे।

विद्वानों का मानना है कि संस्‍कृत का दैनिक प्रयोग सिमट कर शैक्षणिक-अनुष्ठानिक दायरे तक रह गया, जिससे वह “गुम” सी लगने लगी। अब सवाल उठता है—हिन्दी, जो करोड़ों की जुबान है, कहीं अति-अंग्रेज़ीकरण और डिजिटल शॉर्टकट्स की दौड़ में अपनी मिठास न खो दे।


विशेषज्ञ कहते हैं: खतरा भाषा के ख़त्म होने का नहीं, बल्कि शहरी-युवा वर्ग में शुद्धता, साहित्य और दीर्घ-पाठ की आदत घटने का है। समाधान उनके हिसाब से सीधा है—घर-परिवार में हिन्दी की किताबें, स्कूलों में प्रोजेक्ट-आधारित लेखन, और सोशल मीडिया पर बिना फेरबदल के प्रयोग। संस्‍कृत को “गुम” होने से बचाना है तो उसे कोर्स-से बाहर निकाल जीवंत संवाद में लाना होगा; हिन्दी को राह से भटकने से रोकना है तो उसे रोज़-मर्रा की सोच-अभिव्यक्ति में जगह देनी होगी।

Post a Comment

Previous Post Next Post
BREAKING NEWS : Loading...

ताज़ा खबरें

राजनीति समाचार
राजनीति समाचार लोड हो रहे हैं...