ATH NEWS 11:-UP पुलिस की DSP सौम्या अस्थाना ने कथित तौर पर एक फरमान जारी किया है कि अगर पत्रकार थाने के अंदर वीडियोग्राफी करते हैं, तो तुरंत मुकदमा दर्ज होगा। लेकिन सवाल यह है कि क्या ऐसा फरमान कानून से ऊपर है?
*कानूनी हकीकत*
अनुच्छेद 19(1)(a) – अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Press Freedom का मूल आधार) है।
पत्रकार कोई अपराधी नहीं — वे सार्वजनिक हित में सूचना संकलन करते हैं।थाना एक सार्वजनिक स्थान है, कोई निजी परिसर नहीं।सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट के कई फैसले कहते हैं कि प्रेस को बिना वैध कारण रोका नहीं जा सकता।
बिना कानून बताए सिर्फ “आदेश” देना = मनमानी FIR तभी दर्ज हो सकती है जब कानून में स्पष्ट अपराध हो।
*सवाल सिर्फ पत्रकारों का नहीं है*
आज कैमरा रोका गया है, कल आवाज़ रोकी जाएगी…
कानून का राज (Rule of Law) फरमान से नहीं, संविधान से चलता है।
पत्रकार का कैमरा अपराध नहीं है!
कानून से ऊपर कोई नहीं — न वर्दी, न पद
अभिव्यक्ति की आज़ादी संविधान ने दी है, किसी अफ़सर के मौखिक आदेश ने नहीं।


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