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होलिका दहन: अहंकार पर आस्था की विजय-जाने कैसे?




महराजगंज:-होलिका दहन केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि सत्य, भक्ति और साहस की अमर कथा है। यह प्रसंग हमें याद दिलाता है कि जब मन में विश्वास अडिग हो, तो कोई भी विपत्ति हमें डिगा नहीं सकती।

 *पौराणिक प्रसंग* 

प्राचीन काल में असुरराज हिरण्यकश्यप ने घोर तप कर वरदान पाया और स्वयं को ईश्वर मानने लगा। उसने अपने राज्य में आदेश दिया कि सब उसकी पूजा करें। परंतु उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था।


पुत्र की भक्ति से क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने उसे अनेक यातनाएँ दीं, किंतु प्रह्लाद का विश्वास अडिग रहा। अंततः उसने अपनी बहन होलिका को आदेश दिया कि वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठे। होलिका को वरदान था कि अग्नि उसे जला नहीं सकती।

अग्नि प्रज्वलित हुई, पर हुआ कुछ और ही—अहंकार और छल का प्रतीक होलिका जलकर भस्म हो गई, जबकि प्रभु-भक्ति में लीन प्रह्लाद सुरक्षित रहे। यही घटना आज होलिका दहन के रूप में मनाई जाती है।

 *प्रेरक संदेश* 

यह प्रसंग हमें तीन गहरी सीख देता है—

अहंकार का अंत निश्चित है – चाहे शक्ति कितनी भी बड़ी क्यों न हो, अन्याय टिक नहीं सकता।

सच्ची आस्था रक्षा करती है – जब विश्वास दृढ़ हो, तो संकट भी अवसर बन जाता है।

सत्य की जीत होती है – असत्य और अत्याचार का अंत अवश्य होता है।

आज भी होलिका दहन की अग्नि में लोग अपने भीतर के क्रोध, ईर्ष्या, अहंकार और द्वेष को जलाने का संकल्प लेते हैं। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि बाहरी बुराइयों से पहले हमें अपने अंदर की नकारात्मकता को समाप्त करना चाहिए।

         प्रभारी महराजगंज 

            कैलाश सिंह.

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